
अजीत मिश्रा (खोजी)
रेडक्रॉस सोसाइटी बस्ती में ‘सदस्यता’ के नाम पर बड़ा खेल: 221 लोगों का भविष्य अधर में, क्या डकार लिए गए 2.10 लाख रुपये?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- बस्ती रेडक्रॉस में मचा घमासान: कोषाध्यक्ष को ‘पैसे’ का पता नहीं, सदस्यों ने मांगा इस्तीफा!
- अजब बस्ती की गजब रेडक्रॉस: सदस्यता के लिए पैसे तो लिए, पर रसीद देना भूले जिम्मेदार!
- सात महीने बाद भी ‘अधर’ में आजीवन सदस्यता, क्या सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हुआ था चंदा?
- नियमों की धज्जियां उड़ाते ‘हुक्मरान’, सीएमओ के आदेश को भी ठेंगे पर रखता रेडक्रॉस प्रबंधन!
- रेडक्रॉस का ‘खून’ सफेद: सदस्यता शुल्क के नाम पर बड़ा खेल!
- वोटों की गणित में फंसी 221 लोगों की आस्था, जवाब देने से बच रहे पदाधिकारी।
- बस्ती रेडक्रॉस सोसाइटी: पद का लालच भारी, सेवा भाव पर राजनीति की बीमारी!
बस्ती। नर सेवा को नारायण सेवा मानने वाली संस्था ‘भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी’ की बस्ती इकाई इन दिनों सेवा भाव के लिए नहीं, बल्कि आपसी गुटबाजी और ‘धन उगाही’ के गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। सवाल सीधा है—क्या 221 दानदाताओं से लिए गए ₹1,000-₹1,000 कभी उन्हें ‘आजीवन सदस्यता’ दिला पाएंगे, या यह पैसा सिस्टम की भेंट चढ़ चुका है?
7 महीने बीते, न रसीद मिली न सदस्यता
हैरानी की बात यह है कि करीब सात महीने पहले 221 लोगों ने रेडक्रॉस की आजीवन सदस्यता के लिए उत्साहपूर्वक शुल्क जमा किया था। नियमतः इस राशि का 30 प्रतिशत हिस्सा राज्य मुख्यालय को भेजा जाना अनिवार्य है, जिसके बिना सदस्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती। लेकिन आरोप है कि बस्ती इकाई के रसूखदारों ने इस पैसे को दबा रखा है।
कोषाध्यक्ष की ‘लापरवाही’ या ‘अभिज्ञता’ का स्वांग?
मामले में सबसे तीखा प्रहार कोषाध्यक्ष राजेश ओझा पर हो रहा है। चर्चा है कि उन्हें यह तक नहीं मालूम कि नए सदस्यों का पैसा बैंक में जमा है या नहीं। सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस में जब कोषाध्यक्ष ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना चाहा, तो सदस्यों का गुस्सा फूट पड़ा। कुलवेन्द्र सिंह मजहबी जैसे जागरूक लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया कि— “यदि कोषाध्यक्ष होने के बाद भी आपको पैसे की जानकारी नहीं है, तो तुरंत इस्तीफा दे दीजिए।”
कुर्सी की ‘सियासत’ में पिसा सेवा भाव
सूत्रों की मानें तो यह पूरी खींचतान कार्यकारिणी के आगामी चुनाव को लेकर है। डर इस बात का है कि यदि ये 221 नए सदस्य बन गए, तो विरोधियों का पलड़ा भारी हो जाएगा। इसी ‘वोट बैंक’ की राजनीति के चलते अंशदान (शेयर) को राज्य मुख्यालय भेजने से रोका जा रहा है।
मुख्य बिंदु जो खड़े करते हैं गंभीर सवाल:
- 2.10 लाख की जवाबदेही किसकी? सदस्यों का आरोप है कि अभियान के समय बड़े-बड़े दावे करने वाले अब फोन से नंबर तक डिलीट कर रहे हैं।
- सीएमओ के आदेशों की अवहेलना: चर्चा है कि सीएमओ द्वारा लिखित निर्देश दिए जाने के बावजूद अंशदान नहीं भेजा गया।
- आपसी वैमनस्य: रेडक्रॉस जैसी संस्था जहाँ भाईचारा होना चाहिए, वहां अब लोग एक-दूसरे का हालचाल पूछना भी पसंद नहीं कर रहे।
बदनामी की कगार पर ‘बस्ती रेडक्रॉस’
मीडिया और जनता के बीच यह चर्चा आम है कि यदि पदाधिकारी पद के लिए जितने लालायित हैं, उतने ही सोसाइटी की बेहतरी के लिए होते, तो आज यह बदनामी न होती।
साफ है कि बस्ती रेडक्रॉस में सेवा कम और ‘सियासत’ ज्यादा हो रही है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस वित्तीय अनियमितता और मनमानी पर कब लगाम कसता है, या फिर इन 221 लोगों का पैसा और भरोसा यूँ ही सिस्टम की फाइलों में दम तोड़ देगा।
















